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निस्वार्थी: पर्यावरण पद दर्शन प्रकृति, पर्यावरण-संरक्षण और मानव के प्राकृतिक उत्तरदायित्व को केंद्र में रखकर रची गई एक पद्यात्मक साहित्यिक कृति है।
यह पुस्तक केवल पर्यावरण विषय पर आधारित काव्य-संग्रह नहीं है, बल्कि भारतीय पद्य परंपरा की समतुकांत चतुष्पदी (AAAA) शैली को पुनः स्मरण और वर्तमान पीढ़ी तक पहुँचाने का साहित्यिक प्रयास भी है। प्रत्येक पद में विषय की स्पष्टता, भाषा की सरलता और भाव की सहजता के साथ जन-जागरण का उद्देश्य रखा गया है।
कृति में प्रकृति-वंदना, पंचमहाभूत, वृक्षों का महत्त्व, जल-संरक्षण, नदियाँ, वर्षा, पर्वत, मिट्टी, वन एवं वन्यजीव, पक्षियों की दुनिया, जैव-विविधता, प्रदूषण, प्लास्टिक संकट, जलवायु परिवर्तन, किसान और पर्यावरण, गाँव और प्रकृति, शहर और प्रदूषण, ऊर्जा-संरक्षण तथा स्वच्छता जैसे अनेक विषयों को पद्यात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है।
पुस्तक में प्रत्येक पद के साथ सरल भावार्थ भी दिया गया है, जिससे विद्यार्थी, शिक्षक, सामान्य पाठक और पर्यावरण-प्रेमी पाठक विषय को आसानी से समझ सकें।
पुस्तक का मूल संदेश है कि प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि मानव जीवन और समस्त जीव-जगत का आधार है। जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि और आकाश जैसे पंचमहाभूतों का संतुलन बनाए रखना तथा प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करना प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी है।
यह कृति पाठकों में प्रकृति-प्रेम, पर्यावरणीय चेतना, संरक्षण की भावना और आने वाली पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी विकसित करने का एक साहित्यिक प्रयास है।
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