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यह पुस्तक अस्मिता निषाद द्वारा लिखित मानसिक स्वास्थ्य और आत्म-चिंतन पर आधारित है, जिसका उद्देश्य युवाओं में अवसाद, अकेलेपन और 'मजबूत होने' के नकली मुखौटे के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। मात्र 16 वर्ष की लेखिका ने अपने ग्रामीण परिवेश और जीवन के व्यक्तिगत संघर्षों (जैसे स्कूल प्रवेश परीक्षा में असफलता) से सीख लेते हुए इस किताब को बुना है। पुस्तक का मुख्य संदेश यह है कि समाज के डर से अपनी भावनाओं को दबाना और हर वक्त "ठीक हूँ" कहना मानसिक रूप से थका देता है; ऐसे में रोना कमजोरी नहीं बल्कि आत्मा की शुद्धि है, और जब कोई बिना जज किए आपकी बात सुनने वाला न हो, तो कोरा कागज़ और डायरी आपके सबसे वफादार दोस्त बनकर मन का बोझ हल्का कर सकते हैं।
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