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रेत और कंक्रीट
एक शहर जो ठहरना जानता है।
एक लड़की जो रुकना नहीं जानती।
नैतिक बनारस की उन पुरानी इमारतों का दीवाना है जिन्हें दुनिया खंडहर कहकर भूल चुकी है। उसके लिए हर टूटी हुई दीवार, हर पुराना दरवाज़ा और हर पत्थर की अपनी एक कहानी है।
अहाना दिल्ली की कॉर्पोरेट दुनिया की उभरती हुई पेशेवर है। उसकी ज़िन्दगी डेडलाइन, मीटिंग और सफलता की दौड़ में बीतती है। जब काम के सिलसिले में उसे बनारस आना पड़ता है, तो वह इसे एक साधारण असाइनमेंट समझती है।
लेकिन बनारस कभी किसी के लिए सिर्फ एक शहर नहीं रहता।
घाटों की सीढ़ियों, तंग गलियों, कुल्हड़ की चाय और धूल भरी दोपहरों के बीच नैतिक और अहाना की दुनिया टकराती है। धीरे-धीरे दोनों को एहसास होता है कि वे सिर्फ एक-दूसरे को नहीं, बल्कि खुद को भी नए सिरे से समझ रहे हैं।
पर क्या दो लोग, जिनकी मंज़िलें अलग हों, एक ही रास्ते पर चल सकते हैं?
रेत और कंक्रीट एक ऐसी प्रेमकथा है जो साथ रहने से ज़्यादा, एक-दूसरे को समझने की बात करती है। यह उपन्यास बनारस की आत्मा, आधुनिक जीवन की बेचैनी और उन रिश्तों की कहानी है जो भले ही मुकम्मल न हों, लेकिन अधूरे भी नहीं होते।
कुछ प्रेम कहानियाँ ख़त्म नहीं होतीं—वे बस जीवन का हिस्सा बन जाती हैं।
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