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गनुआ राम बोलना नहीं जानता था। यह उसकी कमज़ोरी नहीं थी, यह उसकी सज़ा थी।
उसने एक बार अपनी भाषा में जवाब दिया था, और उसके बाद अठारह साल चुप रहा।
उसकी बेटी सुगिया ने चौरासी प्रतिशत लाकर भी वही चुप्पी विरासत में पाई।
जब गाँव ने उसका तिलक तय किया, जब उसकी चादरें उतर गईं, जब उसका स्कूल काग़ज़ों पर बन गया,
तब उसने चॉक उठाई और दीवार पर लिखना शुरू किया।
यह उस आदमी की कहानी है जिसके पास बोलने के लिए कोई भाषा नहीं बची थी,
और उस लड़की की, जिसने अपनी भाषा खुद बनाई।
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