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समय के साथ समाज बदलता है और जीवन के साधन भी बदलते रहते हैं।आज का युग तकनीक का युग है। मोबाइल, इंटरनेट और डिजिटल दुनिया ने हमारे जीवन को पहले से कहीं अधिक तेज़ और सुविधाजनक बना दिया है।
लेकिन इस परिवर्तन के बीच एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी खड़ा होता है—क्या इस तेज़ गति वाली दुनिया में हम अपने बच्चों को जीवन के मूल संस्कार भी दे पा रहे हैं?
“स्क्रीन से संस्कार तक” एक ऐसी कहानी है जो इसी प्रश्न के इर्द-गिर्द घूमती है।
इस उपन्यास की कथा एक दादी की दृष्टि से कही गई है, जो अपने पोते के साथ होने वाली रोज़मर्रा की बातचीत के माध्यम से जीवन के छोटे-छोटे सत्य, अनुभव और संस्कारों की महत्ता को सामने लाती है।
यह कहानी किसी तकनीक के विरोध की नहीं, बल्कि संतुलन की खोज की कहानी है—जहाँ स्क्रीन की दुनिया भी है और संस्कारों की रोशनी भी।
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