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# पार्थ सारथी
*अर्जुन और कृष्ण के अटूट रिश्ते को समर्पित*
महाभारत केवल दो पक्षों के मध्य लड़ा गया एक युद्ध नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चलने वाले धर्म और अधर्म, मोह और कर्तव्य, अहंकार और समर्पण के संघर्ष की अमर गाथा है।
**‘पार्थ सारथी’** उसी महागाथा का एक काव्यात्मक पुनर्कथन है, जिसमें कुरुक्षेत्र की रणभूमि से लेकर धर्म की अंतिम विजय तक की घटनाओं को शब्दों और भावों में पिरोने का प्रयास किया गया है।
यह रचना अर्जुन के विषाद, श्रीकृष्ण के उपदेश, भीष्म की प्रतिज्ञा, अभिमन्यु के अदम्य साहस, कर्ण के संघर्ष, दुर्योधन के अहंकार और महायुद्ध के हृदयविदारक परिणामों को अपने भीतर समेटे हुए है।
इस काव्य का केंद्र केवल युद्ध नहीं, बल्कि **पार्थ और उनके सारथी के बीच का वह अटूट विश्वास है**, जहाँ एक ओर अर्जुन के मन में असंख्य प्रश्न हैं और दूसरी ओर श्रीकृष्ण के पास उन प्रश्नों को दिशा देने वाला ज्ञान।
जब अपने ही सामने शत्रु बनकर खड़े हों, जब कर्तव्य और भावनाएँ आमने-सामने हों और जब मनुष्य स्वयं अपने निर्णयों से विचलित हो जाए, तब उसे केवल शस्त्र नहीं, एक सच्चे सारथी की आवश्यकता होती है।
‘पार्थ सारथी’ उसी विश्वास, उसी मार्गदर्शन और उसी सनातन संदेश को समर्पित एक विनम्र साहित्यिक प्रयास है।
**क्योंकि जीवन के प्रत्येक कुरुक्षेत्र में विजय केवल उसके हाथ आती है, जिसका सारथी सत्य और धर्म हो।**
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