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गुरु केवल मार्गदर्शक नहीं होता, वह जीवन को दिशा देने वाला प्रकाश होता है।
‘गुरु दक्षिणा’ पं. वेद प्रकाश शास्त्री द्वारा डॉ. अशोक कुमार जाखड़ ‘निस्वार्थी’ के प्रति श्रद्धा, सम्मान, कृतज्ञता और आत्मीय भावनाओं की एक भावपूर्ण साहित्यिक अभिव्यक्ति है।
यह पुस्तक केवल किसी व्यक्तित्व का परिचय नहीं है, बल्कि एक ऐसे कर्मयोगी व्यक्तित्व को समझने और शब्दों में प्रस्तुत करने का प्रयास है, जिसने राष्ट्रसेवा, समाजसेवा, साहित्य, संस्कार और मानवीय मूल्यों को अपने जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया।
लेखक ने अपने अनुभवों, विचारों, कविताओं, प्रार्थनाओं, शुभकामनाओं और विभिन्न लेखों के माध्यम से डॉ. अशोक कुमार जाखड़ ‘निस्वार्थी’ के व्यक्तित्व और जीवन-दृष्टि को सामने रखा है। पुस्तक की आत्मा गुरु-शिष्य के पवित्र संबंध, श्रद्धा, विनम्रता, सेवा और संस्कार में दिखाई देती है।
इस पुस्तक में ‘निस्वार्थी’ जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के साथ-साथ उनके परिवार, राष्ट्रसेवा, समाजसेवा, कर्मनिष्ठा, अनुशासन, संस्कार और जीवन-दर्शन के अनेक पहलुओं को प्रस्तुत किया गया है। मनदीप जाखड़ और देवी पूजा से जुड़े आशीर्वाद, प्रार्थनाएँ तथा भावपूर्ण रचनाएँ भी पुस्तक को एक आत्मीय स्वर प्रदान करती हैं।
लेखक स्वयं स्पष्ट करते हैं कि यह पुस्तक किसी आलोचना या औपचारिक प्रशंसा के लिए नहीं, बल्कि एक शिष्य-भाव से लिखा गया सम्मान-पत्र है—एक ऐसा प्रयास, जिसके माध्यम से आने वाली पीढ़ियाँ एक प्रेरक व्यक्तित्व को जान सकें और उनके जीवन से कुछ सीख सकें।
इस पुस्तक में आपको मिलेगा:
गुरु-शिष्य संबंध की आत्मीय अनुभूति
डॉ. अशोक कुमार जाखड़ ‘निस्वार्थी’ का व्यक्तित्व एवं कृतित्व
राष्ट्रसेवा और समाजसेवा के प्रेरक प्रसंग
संस्कार, सेवा और कर्मनिष्ठा का संदेश
प्रार्थनाएँ, आशीर्वाद और काव्यात्मक अभिव्यक्तियाँ
परिवार और सामाजिक जीवन से जुड़े भावपूर्ण प्रसंग
जीवन-दर्शन और सकारात्मक सोच
नई पीढ़ी के लिए प्रेरणादायक विचार
‘गुरु दक्षिणा’ उन पाठकों के लिए एक भावपूर्ण पुस्तक है जो गुरु-शिष्य परंपरा, हिंदी साहित्य, प्रेरक व्यक्तित्व, सामाजिक सेवा और मानवीय मूल्यों से जुड़ा साहित्य पढ़ना पसंद करते हैं।
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