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सत्य-पिनाक
(सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की अमर सत्यगाथा)
"जब सत्य की रक्षा हेतु राजसिंहासन, परिवार और स्वयं का अस्तित्व भी दांव पर लग गया, तब जन्मी युग-युगांतर को दिशा देने वाली एक अमर गाथा!"
कृति का परिचय:
'सत्य-पिनाक' केवल एक पौराणिक आख्यान नहीं, अपितु धर्म, त्याग और अडिग संकल्प की वह पावन धारा है जो मानव चेतना को कर्तव्यनिष्ठा के सर्वोच्च शिखर से परिचित कराती है। चक्रवर्ती सम्राट राजा हरिश्चंद्र ने सत्य की कसौटी पर खरे उतरने के लिए जिस असीम धैर्य, कष्ट और वैराग्य को स्वीकार किया, वह संपूर्ण मानव जाति के लिए एक अद्वितीय आदर्श है।
इस काव्य-ग्रंथ की विशिष्टता:
हिंदी साहित्य में पहली बार, त्याग और मर्यादा के इस पावन इतिहास को अत्यंत गेय, मधुर और ओजस्वी सवैया छंद में निबद्ध किया गया है। इसका प्रत्येक छंद पाठक के अंतःकरण में सत्य, शुचिता और सांस्कृतिक गौरव की नई ज्योति प्रज्वलित करता है।
पाठकों के लिए मुख्य आकर्षण:
शास्त्रीय छंद-सौंदर्य: पारंपरिक सवैया छंद के अनुपम प्रवाह और नाद-सौंदर्य में रचित अद्वितीय काव्य-रचना।
धर्म और सत्य की पराकाष्ठा: सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र, महारानी तारामती और बालक रोहिताश्व के अगाध त्याग का अत्यंत मार्मिक एवं सजीव चित्रण।
नैतिक चेतना का संचार: आज के युग में भी चारित्रिक दृढ़ता, सदाचार और कर्तव्य-बोध की अमूल्य प्रेरणा देने वाला ग्रंथ।
संग्रहणीय साहित्यिक निधि: सनातन संस्कृति, शास्त्रीय छंदों और गंभीर साहित्य के अनुरागियों के लिए एक अनिवार्य एवं अमूल्य कृति।
सत्य केवल एक शब्द नहीं, जीवन की सर्वोच्च साधना है—इस युगीन साधना के साक्षी बनिए 'सत्य-पिनाक' के संग।
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