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एक मलिन पन्ना पाँच एकांकियों का एक विविधवर्णी संग्रह है, जो एक साथ इतिहास, समाज, परिवार, शिक्षा और न्याय — इन पाँच भिन्न संसारों में प्रवेश करता है। प्रत्येक एकांकी अपने आप में पूर्ण है — अपनी भाषा में, अपने शिल्प में, अपने संदेश में। फिर भी इन सबको एक साथ पढ़ने पर एक समग्र चित्र उभरता है — उस मनुष्य का, जो सदियों से सत्य और स्वार्थ, परंपरा और परिवर्तन, तथा अहंकार और विवेक के बीच झूलता आया है।
लेखक जय प्रकाश सहज ने इस संग्रह में न तो उपदेश का मार्ग चुना है, न आदर्शवाद का। उन्होंने वह रास्ता चुना है जो सबसे कठिन है — सत्य का रास्ता। और वह सत्य कभी ऐतिहासिक राजदरबार में मिलता है, कभी किसी जिला न्यायालय की कुर्सी पर, कभी किसी हरे-भरे खेत में, कभी एक मध्यमवर्गीय परिवार के बैठक-कक्ष में और कभी ज्ञान की एक काल्पनिक अदालत में।
एकांकियों का परिचय
१. एक मलिन पन्ना
(ऐतिहासिक एकांकी)
काल : सन् 1193–94 ई. | स्थान : कन्नौज का राजदरबार
इतिहास के पन्नों पर कुछ नाम ऐसे अंकित हो जाते हैं जिन्हें बाद की पीढ़ियाँ बिना जाँचे स्वीकार कर लेती हैं। कन्नौज नरेश जयचंद उन्हीं में से एक हैं — जिन्हें सदियों से 'देशद्रोही' कहा जाता रहा, पर जिनका वास्तविक इतिहास इस एकरंगी छवि से कहीं अधिक जटिल और मानवीय है।
यह एकांकी उस रात की कहानी है जब कन्नौज के दरबार में एक ओर विजयोत्सव का उल्लास है, और दूसरी ओर अजमेर के महामात्य कैमासा दाहिमा का निर्भीक प्रवेश होता है। दाहिमा के कड़वे किंतु सत्य शब्द जयचंद के अंतःकरण को झकझोर देते हैं। मदिरा के नशे में डूबा एक राजा धीरे-धीरे उस सत्य के सामने खड़ा होता है जिससे वह वर्षों से भागता रहा था — और अंततः प्रायश्चित का मार्ग चुनता है।
केंद्रीय प्रश्न : क्या व्यक्तिगत प्रतिशोध और राष्ट्रीय दायित्व एक साथ चल सकते हैं? और जब कोई अपनी भूल पहचान ले — तब क्या सुधार संभव है?
२. ज़मीन किसकी?
(सामाजिक-व्यंग्यात्मक एकांकी)
काल : समकालीन | स्थान : जिला न्यायालय, नई दिल्ली स्लोगन : "कागज़ कुछ कहते हैं... सबूत कुछ और।"
सुनील एक सीधा-सादा, मेहनती आदमी है जिसने अपने सपनों का घर बनाने के लिए ज़मीन खरीदी। दस्तावेज़ थे, रजिस्ट्री थी, गिफ्ट-शीट थी — सब कुछ था। पर जो नहीं था, वह था असली मालिकाना हक़। अदालत में जब सच सामने आता है, तो पता चलता है कि जिस ज़मीन पर उसने अपना भविष्य बुना था, वह ज़मीन थी ही नहीं उसकी — वह तो सरकार की थी।
यह एकांकी न्याय-व्यवस्था की जटिलताओं पर एक तीखा व्यंग्य है — जहाँ वकीलों की चतुराई, चपरासी की 'सेटिंग', पेशकार का ढर्रा और जज की निष्पक्षता — सब एक साथ एक ऐसे मंच पर उपस्थित होते हैं जो हास्यपूर्ण होते हुए भी गहरी पीड़ा देता है।
केंद्रीय प्रश्न : क्या एक आम आदमी को न्याय मिल सकता है — उस व्यवस्था में जहाँ जानकारी का अभाव ही सबसे बड़ा अपराध माना जाता है?
३. बंद गोभी vs फूल गोभी
(प्रतीकात्मक सामाजिक एकांकी)
काल : समकालीन | स्थान : गाँव का हरा-भरा खेत संदेश : "न अंधी परंपरा, न अंधा परिवर्तन — जीवन का वास्तविक सौंदर्य संतुलन में है।"
यह संग्रह की सबसे रचनात्मक और प्रयोगशील एकांकी है। एक खेत में सब्ज़ियाँ बहस कर रही हैं — और वह बहस है परंपरा बनाम परिवर्तन की। बंद गोभी मर्यादा, संयम और गोपनीयता की पक्षधर है; फूल गोभी खुलेपन, सच्चाई और स्पष्टवादिता की। टमाटर हास्य से माहौल हल्का करता है, मिर्च सीधी बात कहती है, आलू संतुलन की बात करता है और बैंगन — अवसरवादिता का जीवंत उदाहरण बनता है।
इस एकांकी की विशेषता यह है कि यह किसी एक पक्ष को नहीं जिताती। किसान के रूप में आया विवेक यह समझाता है कि दोनों की अपनी-अपनी ज़रूरत है — और जीवन की थाली तब पूरी होती है जब सब मिलकर उसमें योगदान करें।
केंद्रीय प्रश्न : क्या परंपरा और परिवर्तन शत्रु हैं — या एक-दूसरे के पूरक?
४. मोबाइल का मौन
(समकालीन सामाजिक एकांकी)
काल : वर्तमान | स्थान : एक मध्यमवर्गीय परिवार का बैठक-कक्ष, दिल्ली टैगलाइन : "जब घर में सब बोल रहे हों, तब भी संवाद मर सकता है।"
शर्मा परिवार — दादाजी, पिता, माँ, बेटा और बेटी — एक ही छत के नीचे रहते हैं। खाना साथ खाते हैं। पर बातें नहीं करते। हर कोई अपनी स्क्रीन में है। दादाजी की कहानियाँ वर्षों से अनसुनी हैं। माँ की थकान किसी ने नहीं देखी। पिता ने 'ठीक है' कहते-कहते खुद को भुला दिया है। बेटे को याद नहीं कि पिता ने आखिरी बार उसके साथ कुछ किया कब था। और बेटी स्कूल के मंच पर अकेली खड़ी रही — बिना किसी के।
फिर एक रात नेटवर्क बंद हो जाता है — और उस अँधेरे में एक परिवार फिर से परिवार बनता है।
केंद्रीय प्रश्न : क्या तकनीक हमें जोड़ रही है — या हमारे सबसे करीबी रिश्तों से काट रही है?
५. किताबों का मुकदमा
(शैक्षिक-व्यंग्यात्मक एकांकी)
काल : वर्तमान और कालातीत | स्थान : "ज्ञान की अदालत" टैगलाइन : "डिग्रियाँ बढ़ीं, लेकिन ज्ञान कहाँ गया?"
एक काल्पनिक अदालत में किताबें वादी बनकर खड़ी हैं। प्रतिवादी हैं — कोचिंग, शॉर्टकट नोट्स, रटंत शिक्षा और सोशल मीडिया। आरोप है — शिक्षा की आत्मा की हत्या का।
बहस में एक आदर्श शिक्षक अपना दर्द सुनाता है, एक होनहार विद्यार्थी स्वीकार करता है कि उसकी जिज्ञासा कहीं खो गई, एक पुस्तकालय बताता है कि अब कोई उसके पास नहीं आता — और एक मोबाइल पहली बार ईमानदारी से कहता है कि दोष उसका नहीं, उसके उपयोग का है। न्यायाधीश का अंतिम निर्णय न केवल अदालत में, बल्कि दर्शकों के मन में भी गूँजता है।
केंद्रीय प्रश्न : शिक्षा का उद्देश्य क्या है — परीक्षा पास करना, या मनुष्य बनाना?
संग्रह की विशेषताएँ
• विषय-वैविध्य : ऐतिहासिक, सामाजिक, प्रतीकात्मक, पारिवारिक और शैक्षिक — पाँच भिन्न आयाम
• शैली-वैविध्य : गंभीर नाटकीयता से लेकर व्यंग्य और हास्य तक की विस्तृत रेंज
• प्रासंगिकता : हर एकांकी आज के समय से सीधे संवाद करती है
• मंचनीयता : विस्तृत मंच-सज्जा, पात्र-परिचय और प्रकाश-संगीत के निर्देश सहित
• संदेश : प्रत्येक एकांकी एक प्रश्न छोड़ती है — और उत्तर खोजने की ज़िम्मेदारी पाठक पर छोड़ देती है
"इतिहास हो या वर्तमान, अदालत हो या खेत, परिवार हो या विद्यालय — सत्य हर जगह है। बस देखने की दृष्टि चाहिए।"
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