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भारत विश्व सभ्यताओं से पूर्व — ज्ञान-विज्ञान की मातृभूमि
लेखक: डॉ. आकाश चंदा | संपादक: श्रीमती चंदा आकाश
क्या भारत केवल एक देश है — या यह समस्त मानव-सभ्यता की ज्ञान-जननी है?
जब यूरोप और अमेरिका हिमयुगों से जूझ रहे थे, जब विश्व की अन्य सभ्यताएँ अपने शैशव में थीं — तब भारतभूमि पर वेद रचे जा रहे थे, गणित के सूत्र गढ़े जा रहे थे, खगोल के रहस्य उद्घाटित हो रहे थे। यह कृति उसी गौरवशाली सत्य का प्रामाणिक शोध-विवेचन है।
इस ग्रंथ में आप जानेंगे:
विश्व का प्रथम बहुविषयक विश्वविद्यालय — शारदा पीठ (लगभग 5502 ईसा पूर्व) कहाँ था और उसमें क्या पढ़ाया जाता था। ऋषि लगध द्वारा रचित विश्व के प्रथम खगोल-गणित ग्रंथ 'वेदांग ज्योतिष' का महत्त्व क्या है। अठारह महान ऋषियों ने भौतिक विज्ञान के किन मूलभूत सिद्धांतों की खोज की। भारतीय अंक-प्रणाली से प्रभावित होकर अल-बेरूनी ने क्या लिखा। चीन, जापान और कोरिया भारत को 'देवभूमि' क्यों कहते थे। वाराहमिहिर ने किस प्रकार लुप्त प्राच्य विज्ञान का पुनर्जागरण किया। 'यत् पिंडे तद् ब्रह्माण्डे' — विज्ञान और अध्यात्म का वह अद्भुत संगम जो केवल भारत में था।
विशेष:
इस कृति को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी का हार्दिक संदेश एवं माँ शाकुम्भरी विश्वविद्यालय, सहारनपुर की कुलपति प्रो. विमला वाई. का प्राक्कथन प्राप्त है।
पाठक वर्ग: शोधार्थी, इतिहास-प्रेमी, विद्यार्थी, दर्शन एवं विज्ञान में रुचि रखने वाले जिज्ञासु पाठक तथा प्रत्येक भारतीय जो अपनी जड़ों को जानना चाहता है।
प्रकाशक: सह-अरण्य प्राच्य शोध केन्द्र, सहारनपुर
ISBN: 978-81-685335-5-4
पृष्ठ: 72 | प्रथम संस्करण: 21 अप्रैल 2026
"भारत की सभ्यता ने शैशव से नहीं, प्रौढ़ता से यात्रा आरंभ की।"
— डॉ. आकाश चंदा
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