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निरर्थक साम्राज्य
अध्याय 1: सुनहरे सिंहासन का भ्रम
राज्य की चमक-दमक के पीछे छिपी सच्चाई।
अध्याय 2: खाली खजाने की गूँज
धनवान दिखने वाले राज्य की आर्थिक दुर्दशा।
अध्याय 3: चापलूसों का दरबार
जहाँ सत्य की नहीं, प्रशंसा की कीमत थी।
अध्याय 4: भूखी प्रजा, अंधा राजा
जनता की पीड़ा और शासक की उदासीनता।
अध्याय 5: टूटते सपनों का नगर
आम लोगों के बिखरते जीवन और उम्मीदें।
अध्याय 6: ज्ञान का निर्वासन
विद्वानों और सत्य बोलने वालों का पतन।
अध्याय 7: मुखौटों का महोत्सव
झूठ, दिखावा और राजनीतिक छल का उत्सव।
अध्याय 8: विद्रोह की पहली चिंगारी
अन्याय के विरुद्ध उठती पहली आवाज़।
अध्याय 9: सिंहासन की दरारें
सत्ता की नींव में पड़ती कमजोरियाँ।
अध्याय 10: पतन का अंतिम उत्सव
साम्राज्य के अंत से पहले की आखिरी चमक।
अध्याय 11: राख से उठती आशा
नए भविष्य और पुनर्निर्माण की शुरुआत।
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