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‘शिक्षा’ किसी भी समाज के बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक विकास की आधारशिला होती है; विशेष रूप से स्त्री-शिक्षा। स्त्री-शिक्षा न केवल व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाती है; बल्कि पूरे समाज को एक प्रगतिशील दिशा भी प्रदान करती है। यदि हम भारतीय समाज के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में मुस्लिम महिला-शिक्षा की यात्रा का गंभीरतापूर्वक अध्ययन करें; तो ज्ञात होता है कि यह वैचारिक दृढ़- संकल्प और संघर्षशील अदम्य साहस के परिणामस्वरूप परिवर्तित की गई एक दीर्घ प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत होती है। इस शैक्षिक यात्रा में फातिमा शेख का योगदान एक ऐसे प्रकाश-स्तंभ के रूप में उभरता है; जिसे लंबे समय तक इतिहास में हाशिये पर रखा गया।
प्रस्तुत पुस्तक “फातिमा शेख और मुस्लिम महिला चेतना : शिक्षा से सामाजिक परिवर्तन तक” उस ऐतिहासिक रिक्तता को भरने के साथ ही साथ सशक्त महिलाओं के गरिमामयी इतिहास को संरक्षित करने का एक अकादमिक प्रयास है। उन्नीसवीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक रूढ़ियों से ग्रस्त वातावरण में फातिमा शेख ने न केवल बालिकाओं की शिक्षा का मार्ग प्रशस्त किया; बल्कि अंतर-धार्मिक सहयोग और सामाजिक समानता की एक नई परंपरा भी स्थापित की। उनका योगदान यह सिद्ध करता है कि शिक्षा किसी एक समुदाय तक सीमित न होकर सार्वभौमिक सामाजिक- परिवर्तन का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है। यह कृति फातिमा शेख के जीवन, उनके वैचारिक योगदान और उनसे प्रेरित मुस्लिम महिला चेतना के विकास को ऐतिहासिक, सामाजिक और शैक्षिक संदर्भों में विश्लेषित करती है। साथ ही, यह पुस्तक समकालीन भारत में मुस्लिम महिला शिक्षा से जुड़ी चुनौतियों और संभावनाओं पर भी एक सार्थक विमर्श प्रस्तुत करती है। आशान्वित हूं कि यह अध्ययन शोधार्थियों, शिक्षकों और समाज के प्रति संवेदनशील पाठकों के लिए न केवल ज्ञानवर्धक सिद्ध होगा; बल्कि ‘शिक्षा’ को सामाजिक - परिवर्तन के अत्यंत सशक्त
उपकरण के रूप में देखने की एक व्यापक सुदृष्टि भी विकसित करेगा।
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