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एआई के युग में नेतृत्व: रणनीति, कौशल और व्यक्तिगत उत्कृष्टता (भाग - 1)

डॉ. प्रणव कुमार दास गुप्ता
Type: Print Book
Genre: Social Science
Language: Hindi
Price: ₹699 + shipping
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Description

मनुष्य के जीवन में वास्तविक प्रगति केवल ज्ञान प्राप्त करने से नहीं होती; वह सही समझ, सजगता, अनुशासन और निरंतर आत्म-विकास से उत्पन्न होती है। आज के समय में कार्यस्थल, समाज और व्यक्तिगत जीवन - तीनों ही क्षेत्रों में परिस्थितियाँ पहले की तुलना में अधिक जटिल और गतिशील हो चुकी हैं। विशेषतः कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के तीव्र विकास ने कार्य, निर्णय और नेतृत्व की प्रकृति को नई दिशा प्रदान की है। ऐसे परिवेश में केवल सूचना या तकनीकी दक्षता पर्याप्त नहीं होती; आवश्यक है वह व्यावहारिक बुद्धि और नेतृत्व क्षमता जो व्यक्ति को बदलती परिस्थितियों को समझने, संतुलित निर्णय लेने और स्वयं को निरंतर बेहतर बनाने में समर्थ बनाए। इस संदर्भ में श्रीमद्भगवद्गीता प्रबंधन के लिए एक शाश्वत मार्गदर्शक के रूप में सामने आती है जो कर्तव्यनिष्ठा, समत्व और आत्मसंयम के माध्यम से प्रभावी नेतृत्व और संतुलित निर्णय की शिक्षा देती है। इसके सिद्धांत आज के जटिल कार्य-परिवेश में भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने प्राचीन काल में थे।
एआई के युग में नेतृत्व : रणनीति, कौशल और व्यक्तिगत उत्कृष्टता शीर्षक से प्रस्तुत यह पुस्तक उसी परिवर्तनशील युग की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। यह दो भागों में विन्यस्त एक व्यापक पुस्तक है। प्रस्तुत भाग – 1 में उन मूलभूत मानवीय क्षमताओं और विचार-प्रक्रियाओं पर केंद्रित चर्चा की गई है, जो किसी भी व्यक्ति को प्रभावी नेतृत्व, सृजनात्मक चिंतन और संतुलित जीवन की दिशा में अग्रसर करती हैं।
इस भाग में बारह महत्वपूर्ण विषयों को एक सुव्यवस्थित क्रम में प्रस्तुत किया गया है जो व्यक्ति की कार्यकुशलता, मानसिक संतुलन और जीवन-दृष्टि को समृद्ध करने में सहायक हो सकते हैं।
पुस्तक का प्रारंभ सृजनात्मकता और नवाचार से होता है जो यह स्पष्ट करता है कि सृजनात्मक और नवीन विचार किस प्रकार व्यक्ति तथा संगठन दोनों के लिए वास्तविक मूल्य का सृजन करते हैं। इसके पश्चात उत्कृष्टता की आंतरिक ऊर्जा का अध्याय यह बताता है कि श्रेष्ठ कार्य के पीछे बाहरी साधनों से अधिक महत्त्वपूर्ण आंतरिक प्रेरणा और प्रतिबद्धता होती है। इसके आगे कार्य-विलंब प्रवृत्ति पर विजय व्यक्ति को उन मानसिक और व्यवहारगत अवरोधों को पहचानने और उनसे पार पाने की दिशा दिखाता है जो प्रगति के मार्ग में अवरोध बनते हैं। इसके बाद आत्म-विस्तार की प्रक्रिया यह समझाती है कि व्यक्ति अपने अनुभव, अध्ययन और चिंतन के माध्यम से स्वयं को किस प्रकार निरंतर विकसित कर सकता है। पुस्तक के अगले भाग में परिस्थितिजन्य जागरूकता और संदर्भ बोध का महत्त्व स्पष्ट किया गया है जो बदलती परिस्थितियों में उचित दिशा और निर्णय के लिए अत्यंत आवश्यक है। इसके साथ ही समय प्रबंधन की प्रणाली कार्य को अधिक सुव्यवस्थित, समयानुकूल और प्रभावी बनाने के व्यावहारिक उपाय प्रस्तुत करती है। विचारों को वास्तविक उपलब्धियों में परिवर्तित करने की प्रक्रिया को समझाने के लिए संचारों को रूपांतरित करना अध्याय प्रस्तुत किया गया है जबकि प्रस्तुति को रूपांतरित करना यह बताता है कि किसी विचार या कार्य को प्रभावी ढंग से अन्य लोगों तक पहुँचाने की कला कितनी महत्त्वपूर्ण है। इसके बाद विवेकपूर्ण दृष्टि व्यक्ति को यह सिखाती है कि अनेक विकल्पों और सूचनाओं के बीच अपनी प्राथमिकताओं को स्पष्ट रखते हुए किस प्रकार उचित दिशा में ध्यान केंद्रित किया जाए। तेज़ और प्रतिस्पर्धी वातावरण में मानसिक संतुलन बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। इसलिए तनाव में संतुलन और स्पष्टता का अध्याय चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में संयम और स्पष्ट विचार बनाए रखने की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है। इसी क्रम में अवसाद में स्थिरता यह बताती है कि अपनी भावनाओं को संतुलित रखते हुए व्यक्ति जीवन और कार्य दोनों में अधिक परिपक्वता प्राप्त कर सकता है। इस भाग का अंतिम अध्याय संवाद प्रबंधन और मानसिक अवस्थाएँ इस तथ्य को रेखांकित करता है कि मानवीय संबंधों में संवेदनशीलता, संवाद और समझदारी किस प्रकार सामूहिक सफलता और संतुलित नेतृत्व का आधार बनते हैं।
इस पुस्तक की एक विशेष विशेषता यह भी है कि प्रत्येक अध्याय में श्रीमद्भगवद्गीता से प्राप्त शिक्षाओं को समकालीन जीवन और नेतृत्व के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है। गीता के उपदेश कर्म, आत्मसंयम, विवेक, समत्व और कर्तव्यबोध जैसे शाश्वत सिद्धांतों पर आधारित हैं। इन सिद्धांतों को आधुनिक कार्य-संस्कृति, नेतृत्व, निर्णय और आत्म-विकास के आयामों से जोड़कर समझाया गया है ताकि प्राचीन भारतीय ज्ञानपरंपरा और आधुनिक जीवन की आवश्यकताओं के बीच एक सार्थक सेतु स्थापित हो सके।
इसके साथ ही पुस्तक में अनेक स्थानों पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के आधुनिक आयामों को भी समाहित किया गया है। आज एआई केवल एक तकनीकी साधन नहीं रह गया है; वह विचार, विश्लेषण और निर्णय की प्रक्रियाओं को भी प्रभावित कर रहा है। इसलिए प्रत्येक विषय के संदर्भ में यह संकेत किया गया है कि आधुनिक प्रौद्योगिकी इन मानवीय क्षमताओं को किस प्रकार और अधिक विस्तृत तथा प्रभावी बना सकती है।
पुस्तक में दिए गए अध्ययन-प्रसंग वास्तविक जीवन से प्रेरित स्थितियों को सामने लाते हैं। वे पाठक को अपने अनुभवों, निर्णयों और कार्यस्थल की परिस्थितियों को एक नए दृष्टिकोण से देखने में सहायता करते हैं।
यह पुस्तक केवल एक बार पढ़कर समाप्त कर देने के लिए नहीं लिखी गई है। इसका उद्देश्य पाठक को रुककर विचार करने, स्वयं को समझने और अपनी क्षमताओं का विकास करने के लिए प्रेरित करना है। यदि इस पुस्तक को पढ़ते समय पाठक के मन में यह प्रश्न उत्पन्न हो - “क्या मैं इन विचारों को अपने जीवन और कार्य में लागू कर सकता हूँ?” - तो यही इस पुस्तक का वास्तविक उद्देश्य है। क्योंकि ज्ञान का सर्वोच्च रूप वही है जो विचार को क्रिया में परिवर्तित कर दे।

About the Author

डॉ. प्रणव कुमार दास गुप्ता एक प्रतिष्ठित संगणक विज्ञानी एवं प्रबंधन चिंतक हैं। उन्हें इस क्षेत्र में 36 वर्षों से अधिक का सुदीर्घ अनुभव प्राप्त है। संगणक विज्ञान में विद्यावाचस्पति की उपाधि तथा भारतीय प्रबंधन संस्थान अहमदाबाद, कोलकाता और लखनऊ से प्रबंधकीय प्रशिक्षण प्राप्त कर उन्होंने तकनीकी कौशल, सृजनात्मकता और नेतृत्व के मध्य एक अद्वितीय समन्वय स्थापित किया है।

वे 19 पुस्तकों के रचनाकार तथा अनेक शोध आलेखों के लेखक हैं। संगठनात्मक उत्कृष्टता के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग करते हुए उसे श्रीमद्भगवद्गीता के शाश्वत सिद्धांतों एवं व्यावहारिक प्रबंधन दृष्टिकोण के साथ समन्वित करने के लिए वे विशेष रूप से पारंगत हैं।

Book Details

ISBN: 9789358102765
Number of Pages: 214
Dimensions: 5.5"x8.5"
Interior Pages: B&W
Binding: Hard Cover (Case Binding)
Availability: In Stock (Print on Demand)

Ratings & Reviews

एआई के युग में नेतृत्व: रणनीति, कौशल और व्यक्तिगत उत्कृष्टता (भाग - 1)

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