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मनुष्य इस पृथ्वी पर जन्म लेने वाला एकमात्र ऐसा प्राणी है जो न केवल जीता है, बल्कि यह भी पूछता है कि — "मैं क्यों जीता हूँ?" यह प्रश्न ही उसे अन्य सभी जीव-जंतुओं से अलग करता है। पशु-पक्षी, कीट-पतंग, यहाँ तक कि वृक्ष और लताएँ भी जीवन जीती हैं, किंतु वे कभी नहीं पूछतीं कि जीवन का उद्देश्य क्या है। मनुष्य ने जब से इस प्रश्न को पूछा, तभी से धर्म, दर्शन और अध्यात्म का जन्म हुआ।
हजारों वर्ष पहले, जब न कोई विश्वविद्यालय था, न कोई पुस्तकालय — तब भी भारत की धरती पर ऋषि-मुनि वन की एकांत गुफाओं में बैठकर इन्हीं प्रश्नों के उत्तर खोज रहे थे। उनकी साधना, उनका चिंतन और उनकी अनुभूतियाँ ही आज हमारे पास उपनिषद, वेद, गीता, और अनेक दार्शनिक ग्रंथों के रूप में उपलब्ध हैं।
यह पुस्तक उसी महान परंपरा की एक विनम्र झलक प्रस्तुत करने का प्रयास है।
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