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मध्ययुगीन हिंदी साहित्य के अध्ययन में सूफ़ी प्रेमाख्यानक काव्य-परंपरा का अपना विशिष्ट एवं गौरवपूर्ण स्थान है। मुल्ला दाऊद कृत ‘चाँदायन’ से आरंभ होकर कुतुबन कृत ‘मृगावती’, मंझन कृत ‘मधुमालती’, मलिक मुहम्मद जायसी कृत ‘पद्मावत’ तथा उसमान कृत ‘चित्रावली’ तक विस्तृत यह काव्य-धारा केवल भाव एवं कला की दृष्टि से ही समृद्ध नहीं, अपितु सामाजिक चिंतन की दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इन कवियों ने भारतीय लोक-प्रचलित प्रेम-कथाओं को आधार बनाकर, अवधी भाषा एवं मसनवी शैली के माध्यम से, सूफ़ी दर्शन के मूल सिद्धांत—लौकिक प्रेम से अलौकिक प्रेम की प्राप्ति—का प्रतिपादन तो किया ही, साथ ही अपनी रचनाओं में तत्कालीन समाज के विभिन्न पक्षों—परिवार, विवाह, राज्य, धर्म, न्याय, सुरक्षा तथा मानवीय संबंधों—का भी सूक्ष्म एवं सार्थक चित्रण प्रस्तुत किया।
अब तक हिंदी साहित्य के मनीषी विद्वानों ने इन प्रेमाख्यानक काव्यों का अध्ययन प्रमुखतः भाषा-वैज्ञानिक, ऐतिहासिक, तिथि-निर्धारण-संबंधी तथा भक्ति एवं रहस्यवादी दृष्टिकोण से किया है। किंतु इन कृतियों में अंतर्निहित समाज-दर्शन अर्थात् इन कवियों की सामाजिक चेतना, उनकी आदर्श-समाज संबंधी कल्पना तथा समाज-दर्शन के मूल तत्त्वों—मानव-प्रकृति, मानव-समाज, परिवार, विवाह, राज्य एवं धर्म—के परिप्रेक्ष्य में विस्तृत एवं व्यवस्थित अध्ययन अपेक्षाकृत अल्प हुआ है। प्रस्तुत शोध-प्रबंध इसी अपूर्णता की पूर्ति की एक विनम्र चेष्टा है।
इस अध्ययन में समाज-दर्शन को केंद्र में रखते हुए यह जानने का प्रयास किया गया है कि इन सूफ़ी प्रेमाख्यानककारों ने अपने युग के समाज को किस प्रकार देखा, समझा और अपनी रचनाओं में किस प्रकार के आदर्श समाज की परिकल्पना प्रस्तुत की। इसके अंतर्गत यह भी देखने का प्रयत्न किया गया है कि इन कवियों ने मानव-प्रकृति के किन गुणों—दांपत्य, वात्सल्य, सहयोग, साधुता-दुष्टता—को स्वीकार किया; समाज के किन तत्त्वों—समानता-भिन्नता, सहयोग-विरोध, अन्योन्याश्रितता—को महत्त्व दिया; परिवार एवं विवाह की किस संरचना (मुख्यतः पितृसत्तात्मक परिवार तथा नैतिक-सामाजिक वैधता पर आधारित विवाह) को आदर्श माना; राज्य के किन कार्यों—आंतरिक न्याय-व्यवस्था तथा वाह्य सुरक्षा—को अनिवार्य समझा; तथा समाज-धर्म के अंतर्गत किस प्रकार समन्वयात्मक एवं मानवतावादी दृष्टिकोण को भाव-पक्ष और कला-पक्ष दोनों धरातलों पर प्रतिष्ठित किया।
शोध-प्रबंध को सात अध्यायों में विभक्त किया गया है। प्रथम अध्याय में इन पाँचों प्रमुख सूफ़ी प्रेमाख्यानककारों—दाऊद, कुतुबन, मंझन, जायसी एवं उसमान—तथा उनकी कृतियों का विशिष्ट एवं तथ्यात्मक परिचय अंतःसाक्ष्य एवं बहिर्साक्ष्य के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। द्वितीय अध्याय में समाज-दर्शन की सैद्धांतिक भूमि—समाज एवं दर्शन शब्दों का अर्थ-विवेचन, समाज-दर्शन के तत्त्वों का सामान्य परिचय एवं समाज की उत्पत्ति संबंधी विभिन्न सिद्धांतों—पर विचार किया गया है। तृतीय अध्याय में इन प्रेमाख्यानों में चित्रित परिवार एवं विवाह के स्वरूप का विश्लेषण किया गया है। चतुर्थ अध्याय मानव-प्रकृति के विविध पक्षों के अध्ययन को समर्पित है। पंचम अध्याय में मानव-समाज संबंधी तत्त्वों का विवेचन किया गया है। षष्ठ अध्याय में मानव-राज्य तथा सप्तम अध्याय में मानव-समाज-धर्म के अंतर्गत भाव-पक्षीय एवं कला-पक्षीय समन्वयात्मक दृष्टिकोण की विस्तृत विवेचना प्रस्तुत की गई है।
शोध-प्रक्रिया में मूल ग्रंथों के अंतःसाक्ष्य को प्रमुख आधार बनाया गया है और यथासंभव बहिर्साक्ष्य—ऐतिहासिक ग्रंथों, गज़ेटियरों, समकालीन विवरणों—से उसकी पुष्टि करने का प्रयत्न किया गया है। जहाँ-जहाँ पूर्ववर्ती विद्वानों के मतों में मतभेद अथवा त्रुटियाँ दृष्टिगत हुईं, वहाँ यथासंभव तार्किक एवं तथ्यपरक विश्लेषण के आधार पर अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करने का साहस भी किया गया है।
यह स्वीकार करने में संकोच नहीं कि इतने विस्तृत एवं जटिल विषय पर कार्य करते हुए अनेक स्थानों पर मतभेद की संभावना बनी रहती है।
इस शोध-कार्य की पूर्णता में मुझे जिन गुरुजनों, विद्वानों, ग्रंथालयों एवं आत्मीयजनों का सहयोग प्राप्त हुआ, मैं उन सबके प्रति हृदय से आभार व्यक्त करता/करती हूँ। आशा है कि प्रस्तुत शोध-प्रबंध मध्ययुगीन सूफ़ी प्रेमाख्यानक काव्य-परंपरा के समाज-दर्शनपरक अध्ययन की दिशा में एक सार्थक योगदान सिद्ध होगा।
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