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**हिंदी साहित्य : नए संदर्भ और आयाम** एक शोधपरक एवं अकादमिक ग्रंथ है, जो हिंदी साहित्य की विविध विधाओं, सामाजिक सरोकारों और समकालीन विमर्शों का व्यापक अध्ययन प्रस्तुत करता है। डॉ. जी. वसंती द्वारा संपादित यह पुस्तक साहित्य को समाज, संस्कृति, मानवीय संवेदना और बदलते जीवन-मूल्यों के संदर्भ में समझने का अवसर प्रदान करती है।
इस पुस्तक में हिंदी साहित्य के विभिन्न पक्षों पर आधारित शोध आलेख संकलित हैं। इनमें मोहन राकेश के नाटक *आधे-अधूरे* में सामाजिक यथार्थ, प्रेमचंद के कथा-साहित्य में सामाजिक विषमताएँ, हिंदी रेडियो एकांकी की प्रगति एवं संभावनाएँ, हिंदी साहित्य और भारतीय समाज का संबंध, आदिवासी जनजीवन एवं अधिकार तथा लीलाधर जगूड़ी की कविता में प्रतिरोध, प्रकृति और मनुष्यता जैसे विषयों का विश्लेषण किया गया है। इसके अतिरिक्त, काका हाथरसी के हास्य-व्यंग्य में लोकमंगल की अवधारणा पर भी विचार किया गया है।
यह ग्रंथ साहित्य और समाज के पारस्परिक संबंधों, सामाजिक परिवर्तन, सांस्कृतिक चेतना, मानवीय मूल्यों तथा साहित्यिक आलोचना की विविध दिशाओं को समझने में सहायक है। इसकी विषयवस्तु हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों, शोधार्थियों, शिक्षकों और साहित्य के गंभीर पाठकों के लिए उपयोगी है।
यदि आप हिंदी साहित्य का अध्ययन केवल रचनाओं तक सीमित न रखकर उनके सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय संदर्भों में करना चाहते हैं, तो यह पुस्तक आपके अध्ययन और शोध के लिए एक उपयोगी संदर्भ ग्रंथ है।
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