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बनारस की गलियाँ टेढ़ी हैं—कहीं अचानक मुड़ जाती हैं, कहीं इतनी संकरी कि दो लोग आमने-सामने आ जाएँ तो एक को दीवार से सटकर निकलना पड़े। लेकिन इन्हीं गलियों में रहने वाले लोग अपने मन से सीधे हैं—सरल, भावुक, अपनत्व से भरे और रिश्तों को आखिरी साँस तक निभाने वाले।
“टेढ़ी गलियाँ, सीधे लोग” बनारस की इन्हीं गलियों, घाटों, मंदिरों, मोहल्लों और उनमें बसने वाले लोगों की कहानियों का उपन्यास है। इसमें अलग-अलग पात्रों की जिंदगी के माध्यम से प्रेम, दोस्ती, त्याग, अपराध, पश्चाताप, बिछड़ना, सामाजिक बदलाव और इंसानी रिश्तों की गहराई को सामने लाया गया है।
इन कहानियों में कहीं प्रेम अपने अधूरेपन में भी पूरा दिखाई देता है, कहीं एक अपराधी के भीतर छिपा इंसान परिस्थितियों से लड़कर शिक्षक बन जाता है। कहीं मन्नू गुरु और केसर का प्रेम बनारस के बदलते सांस्कृतिक संसार की त्रासदी बन जाता है, तो कहीं बसंती चाची के माध्यम से विकास की तेज रफ्तार के बीच उजड़ते पुराने बनारस का दर्द सामने आता है।
इन पात्रों की जिंदगी अलग-अलग रास्तों से गुजरती है, लेकिन उनकी कहानियाँ एक-दूसरे से अनजाने में जुड़ती जाती हैं। कोई गंगा के किनारे छूट जाता है, कोई किसी पुराने मकान की दीवारों में अपनी यादें छोड़ जाता है और कोई महादेव के शहर में अपने प्रेम और विश्वास को आखिरी साँस तक थामे रहता है।
यह सिर्फ बनारस की कहानियों का संग्रह नहीं, बल्कि उस बनारस की तलाश है जो ईंट-पत्थरों से नहीं, बल्कि लोगों की स्मृतियों, रिश्तों और अपनत्व से बना है।
“टेढ़ी गलियाँ, सीधे लोग” उन लोगों की कथा है जो बदलते समय के बीच भी अपने भीतर के बनारस को बचाए रखते हैं।
क्योंकि—
बनारस की गलियाँ चाहे जितनी टेढ़ी हों,
यहाँ के लोगों के दिल हमेशा सीधे रहे हैं।
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