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“मृत्युंजय कर्ण” कर्ण के जीवन, संघर्ष और अंतर्मन को एक अलग दृष्टि से प्रस्तुत करने वाली एक दीर्घ काव्य-रचना है।
जो कर्ण से जुड़े कई प्रश्नों पर हमें विचार करने के लिए मजबूर करती है।
क्या मनुष्य की पहचान उसके जन्म से होती है, या उसके कर्मों से?
क्या निष्ठा मनुष्य को सही और गलत से परे कर देती है?
क्या परिस्थितियाँ मनुष्य का भाग्य तय करती हैं, या उसके निर्णय?
और क्या मृत्यु किसी व्यक्ति की कथा को समाप्त कर सकती है?
सूर्यपुत्र होकर भी पहचान के संघर्ष से गुजरने वाला कर्ण, आजीवन राधेय के रूप में पला, अपने सामर्थ्य को सिद्ध करने के लिए जीवन भर संघर्ष करता रहा और परिस्थितियों के बीच अपनी निष्ठा, आत्मसम्मान और अस्तित्व की लड़ाई लड़ता रहा।
यह रचना कर्ण को केवल एक महान योद्धा या दानवीर के रूप में नहीं देखती, बल्कि उसके भीतर के मनुष्य को सामने लाने का प्रयास करती है—उस मनुष्य को, जिसके जीवन में सम्मान और अपमान, निष्ठा और धर्म, त्याग और इच्छा, पराक्रम और नियति लगातार एक-दूसरे से टकराते रहे।
कर्ण की कथा केवल उसके जन्म और मृत्यु की कथा नहीं है। यह पहचान, संघर्ष, स्वाभिमान, निष्ठा, त्याग और नियति के बीच अपने अस्तित्व को तलाशते एक मनुष्य की यात्रा है।
कर्ण युद्धभूमि में मृत्यु को प्राप्त हुआ, लेकिन उसकी कथा वहीं समाप्त नहीं हुई। उसके जीवन से जुड़े प्रश्न, उसके निर्णय और उसका व्यक्तित्व आज भी स्मृति में जीवित हैं।
“मृत्युंजय कर्ण” उसी अमर कथा को एक दीर्घ काव्य के रूप में देखने और महसूस करने का एक प्रयास है।
कर्ण युद्धभूमि में अवश्य मर गया,
पर उसकी की कथा नहीं अभी भी जीवित है।
शायद इसी अर्थ में—
कर्ण मृत्युंजय है।
अगर आप हिन्दी काव्य, महाभारत के पात्र और विशेष करके सूर्यपुत्र, दानवीर कर्ण के बारे में पढ़ने या जानने में रुचि रखते है, तो यह पुस्तक आपके लिए एक बहुत ही अच्छी साबित हो सकती है। तो इस पुस्तक को पाने के लिए अभी अपनी पुस्तक की प्रत सुनिश्चित करें।
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