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एक रात... जिसने सब कुछ छीन लिया।
बीस साल... जिसने एक नई रूह को गढ़ा।वक्त की रेत पर जो निशान मिट गए थे, उन्हें आज फिर उभरना है,
मंझधार तो बहुत देखीं, अब समंदर को पार उतरना है।
वो जो बीस साल पहले रुकी थी कलम, उसे अब फिर से चलाना है,बता दो दुनिया को कि 'औरत' का गिरना नहीं, उठना ही असली जमाना है।"
नंदिता के लिए वह रात जश्न की होनी चाहिए थी—मैट्रिक पास करने की ख़ुशी, सुनहरे भविष्य के सपने। पर नियति को कुछ और ही मंजूर था। एक पल की दरिंदगी ने उसके सपनों को रौंद डाला, उसके पिता का साया छीन लिया और अपनों की निष्ठुरता ने उसे बीच मंझधार में मरने के लिए छोड़ दिया।
लेकिन क्या एक औरत का अंत वहीं हो जाता है जहाँ दुनिया उसे खत्म मान लेती है?
'औरत' एक ऐसी लड़की की दास्तान है जिसने अपनी बेबसी को ढाल बनाया और अपनी खामोशी को चीख। यह कहानी है उस मंझधार से निकलकर समंदर जीतने की। २० साल बाद, जब अतीत का वह काला साया फिर से सामने आता है, तब वह अबला नंदिता नहीं, बल्कि न्याय की एक फौलादी दीवार बनकर खड़ी होती है।यह बदला नहीं, यह पुनर्निर्माण है।यह हार नहीं, यह एक 'विजेता' का शंखनाद है।
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