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एक मुसाफ़िर का घर से निकलना
और तमाम सफ़र के बाद किसी एक सफ़र में मंज़िल को भूल जाना।
एक रास्ते पर हमेशा के लिए उसका ठहर जाना,
मंज़िल को भूल कर उस पर आशिक़ हो जाना।
उसी को कोसना और उसी से दुआ मांगना,
उसी से दूरी बनाना और उसी से साथ मांगना।
सुबह से शाम तलक उसी को चाहना,
और फिर रात को उसी को सोचना।
एक इंसान का घर से निकलना,
फिर घर को ही ना पहचान पाना।
इस दर से उस दर भटकना,
और फिर हमेशा के लिए सफ़र का हो जाना।
थक कर बैठ जाना एक पेड़ की छाँव में,
फिर उसी पेड़ को खुदा बुलाना।
जिंदगी में खुद के लिए एक ठिकाना बनाना,
पहले मुरीद होना उसका, फिर और उसी को माशूक बनाना।
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