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एक आगी के सौ भागी छत्तीसगढ़ी लोकजीवन, जनभाषा, कहावतों और लोक-अनुभवों से जुड़ी एक अनोखी पुस्तक है।
इस पुस्तक के शीर्षक के पीछे एक वास्तविक घटना है। गाँव चिरचारी खुर्द के दुर्गा मंच पर गीत गाने के दौरान लेखक निखिल डोंगरे ने एक ऐसी बात सुनी, जिसने उन्हें छत्तीसगढ़ी भाषा के सहज हास्य, व्यंग्य और गहरे अर्थों की ओर आकर्षित किया।
“कइसे आही, बिचारा घर कपाट लगइया नई है” जैसे संवादों से प्रेरित होकर लेखक ने स्थानीय बोलचाल, कहावतों और जनजीवन में प्रचलित रोचक अभिव्यक्तियों को संकलित करने की यात्रा शुरू की।
यह पुस्तक छत्तीसगढ़ी भाषा की सहजता, ग्रामीण जीवन की जीवंतता और लोक-अनुभवों की उस संपदा को सामने लाने का प्रयास है, जो सामान्य बातचीत में छिपी रहती है।
यह रचना उन पाठकों के लिए है जो छत्तीसगढ़ी भाषा, संस्कृति, लोककथन और गाँव की मौलिक अभिव्यक्तियों को जानना और सहेजना चाहते हैं।
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