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"क्या मैं बुद्ध बन पाऊँगा?" केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि स्वयं से पूछे गए उन प्रश्नों की यात्रा है जिनसे लगभग हर व्यक्ति कभी न कभी गुजरता है।
क्या दुख से मुक्त हुआ जा सकता है?
क्या सच्ची खुशी बाहर है या हमारे भीतर?
क्या लोग सच में बदलते हैं?
क्या बुद्ध बनना केवल इतिहास की बात है, या आज भी संभव है?
लेखक पुष्पेंद्र तंवर ने इस पुस्तक में जीवन, रिश्तों, दुख, लगाव, अहंकार, आत्म-स्वीकृति और आत्म-जागरूकता जैसे विषयों को सरल और सहज भाषा में प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक किसी धार्मिक उपदेश या अंतिम सत्य का दावा नहीं करती, बल्कि पाठक को अपने भीतर झाँकने और स्वयं उत्तर खोजने के लिए प्रेरित करती है।
यदि आपने कभी अपने जीवन, अस्तित्व या मन की उलझनों पर गंभीरता से विचार किया है, तो यह पुस्तक आपके लिए है। हर अध्याय आपको एक नया प्रश्न देगा और शायद उसी प्रश्न में आपको अपने जीवन की नई दिशा भी मिल जाए।
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