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कविता अक्सर वहाँ जन्म लेती है जहाँ शब्द कम पड़ जाते हैं।
मनुष्य अपने जीवन में बहुत कुछ महसूस करता है—प्रेम, बिछड़ना, अकेलापन, उम्मीद, डर, पछतावा और मृत्यु का मौन एहसास। लेकिन हर भावना को बोल पाना आसान नहीं होता। कुछ अनुभव केवल महसूस किए जा सकते हैं और कविता उन्हें आवाज़ देने का प्रयास करती है।
“शहर में कुछ भी अजनबी नहीं था” केवल शहर की कहानी नहीं है। यह हर उस इंसान की कहानी है जिसने जीवन की भीड़ में कभी न कभी अपने भीतर एक खालीपन महसूस किया है।
यह संग्रह उन क्षणों की कविताएँ हैं जहाँ इंसान स्वयं से प्रश्न करता है—
क्या हम वास्तव में जी रहे हैं या केवल समय के साथ चलते जा रहे हैं?
क्या रिश्ते हमेशा हमारे होते हैं?
क्या यादें मृत्यु के बाद भी किसी को जीवित रख सकती हैं?
क्या उम्मीद उस समय भी बची रहती है जब चारों तरफ़ अंधेरा हो?
इन कविताओं में शहर है, लेकिन शहर के पीछे छिपा हुआ इंसान भी है। यहाँ भीड़ है, लेकिन उसके बीच का अकेलापन भी है। यहाँ मृत्यु का विचार है, लेकिन जीवन से प्रेम भी है।
यह पुस्तक जीवन को किसी अंतिम उत्तर की तरह नहीं देखती, बल्कि एक यात्रा की तरह देखती है—एक ऐसी यात्रा जिसमें हर व्यक्ति कुछ खोता है, कुछ सीखता है और अंत में अपने भीतर लौटने की कोशिश करता है।
शायद ज़िंदगी का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि हम सब जानते हैं कि सब कुछ एक दिन समाप्त हो जाएगा, फिर भी हम प्रेम करते हैं, सपने देखते हैं और उम्मीद रखते हैं।
यही मनुष्य होने की सबसे सुंदर बात है।
— फ़ज़ल अबुबक्कर एसफ़
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