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क्या सिर्फ़ पाँच हज़ार रुपये लेकर, बिना किसी तय योजना के पहाड़ों की यात्रा पर निकला जा सकता है?
साल 2024 में, जीवन की परेशानियों, आर्थिक कठिनाइयों और भविष्य की अनिश्चितताओं से जूझते हुए मनाश भारद्वाज ने हिमाचल प्रदेश की अठारह दिनों की एकल यात्रा शुरू की। सीमित बजट, अनजान रास्ते और शारीरिक चुनौतियों के बीच यह सफ़र सिर्फ़ नई जगहों को देखने का नहीं, बल्कि खुद को समझने का प्रयास भी था।
विपश्यना ध्यान केंद्र की शांति से लेकर हिमालय की खूबसूरती तक, अनजान लोगों की मदद से लेकर अप्रत्याशित मुलाकातों तक—इस यात्रा में कई ऐसे अनुभव मिले जिन्होंने जीवन को देखने का नज़रिया बदल दिया।
यह किताब एक सच्चा यात्रा-संस्मरण है, जिसमें सीमित साधनों में यात्रा करने के अनुभव, संघर्ष, मानवीय संवेदनाएँ, आत्मचिंतन और आत्म-खोज की कहानी दर्ज है।
क्योंकि कभी-कभी मंज़िल तक पहुँचना ज़रूरी नहीं होता—सफ़र में खुद को पहचानना ज़्यादा मायने रखता है।
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