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"कुछ ज़िक्र ऐसे भी..." मन में उठते उन एहसासों का संग्रह है जिन्हें अक्सर हम शब्द नहीं दे पाते — कभी उम्मीद और निराशा की लहरें, कभी टूटते-बनते रिश्तों की परछाइयां, तो कभी किसी के इंतज़ार में बीतती एक पूरी उम्र। ये कविताएं तीन पड़ावों से होकर गुज़रती हैं — जीवन की परछाइयां, जो वक़्त और हालात के साथ बदलते नज़रिए की बात करती हैं; मेरा चेहरा, जो आत्ममंथन से बनी एक स्त्री की पहचान और आत्मविश्वास की कहानी है; और इंतज़ार, जो प्रेम, विरह और उम्मीद के उन पलों को शब्द देता है जिन्हें अक्सर सिर्फ महसूस किया जा सकता है, कहा नहीं जा सकता।
सरल, आमफ़हम भाषा में लिखी गई ये कविताएं एक नारी के जीवन को समर्पित हैं — जो हमेशा औरों के लिए खुद को बदलती है, पर जब खुद के लिए बदलना चाहती है, तो संघर्ष और गहरा हो जाता है। बचपन की यादों से लेकर टूटे हुए भरोसे तक, खामोश शिकायतों से लेकर खुद को फिर से खोज लेने तक — "कुछ ज़िक्र ऐसे भी..." हर उस पाठक के लिए है जो अपने भीतर की खामोशी में कोई साथी ढूंढ रहा है।
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