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यह केवल एक कविता संग्रह नहीं, बल्कि हमारे समय के कोलाहल और मौन को समझने का एक ईमानदार प्रयास है। अपनी पहली पुस्तक 'विप्लवी कविता' में जहाँ राजेश शर्मा 'राज' ने व्यवस्था के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाई थी, वहीं दूसरी पुस्तक 'शब्दों का शून्य - जो अनकहा रह गया' में उन्होंने अंतर्मन की गहराइयों को टटोला था। यह तीसरी पुस्तक उन दोनों भावों का एक सहज और परिपक्व समन्वय है। इस संग्रह में जहाँ एक ओर सत्ता के पाखंड, अन्याय और सिस्टम की कमियों पर बेबाक प्रहार है, वहीं दूसरी ओर इसमें प्रेम की कोमलता, नश्वरता का बोध और ईश्वर से संवाद का गहरा ठहराव भी है। यह संग्रह उन पाठकों के लिए है जो यथार्थ की बेचैनी और भीतर की शांति, दोनों को एक साथ महसूस करना चाहते हैं।
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