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मौन की महागाथाएँ

रुपेश रंजन
Type: Print Book
Genre: Poetry
Language: Hindi
Price: ₹421 + shipping
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Description

यह काव्य-पुस्तक भारतीय महाकाव्य परंपरा की पाँच महान स्त्रियों—कुन्ती, गांधारी, सीता, तारा और मंदोदरी—के जीवन, संघर्ष और आंतरिक शक्ति का काव्यात्मक अन्वेषण है। यह संग्रह इतिहास को दोहराने का प्रयास नहीं करता, बल्कि उन भावनाओं, प्रश्नों और नैतिक द्वंद्वों को स्वर देता है जिन्हें समय ने प्रायः मौन में छोड़ दिया।

इस पुस्तक की कविताएँ इन स्त्रियों को केवल पौराणिक पात्रों के रूप में नहीं, बल्कि संवेदनशील, विचारशील और निर्णय लेने वाली चेतनाओं के रूप में प्रस्तुत करती हैं। यहाँ मातृत्व है, पर उसके साथ असहायता भी है; त्याग है, पर उसके पीछे छिपा आत्मबल भी है; मौन है, पर वह प्रश्नों और विरोध से भरा हुआ है।

कुन्ती की कविताएँ माँ होने के बोझ, अपराधबोध और दूरदर्शिता को उद्घाटित करती हैं।
गांधारी के माध्यम से सत्ता, नैतिकता और मौन की कीमत पर प्रश्न उठाए गए हैं।
सीता की कविताएँ स्त्री की गरिमा, आत्मसम्मान और सत्यनिष्ठा का उत्सव हैं।
तारा विवेक, राजनीतिक समझ और भावनात्मक बुद्धिमत्ता का स्वर हैं।
और मंदोदरी धर्म, करुणा और अहंकार के विरुद्ध खड़ी अंतरात्मा का प्रतीक बनकर सामने आती हैं।

यह पुस्तक नारी-शक्ति को आदर्शीकरण के बजाय यथार्थ के धरातल पर रखती है—जहाँ पीड़ा भी है, दुविधा भी, और फिर भी एक अडिग नैतिक दृढ़ता है। यह संग्रह पाठक को यह सोचने के लिए आमंत्रित करता है कि महानता तलवार या सत्ता में नहीं, बल्कि सही के पक्ष में खड़े होने के साहस में निहित होती है।

यह कृति उन सभी पाठकों के लिए है जो भारतीय परंपरा को नए दृष्टिकोण से पढ़ना चाहते हैं, जो स्त्री-स्वर की गहराई को समझना चाहते हैं, और जो कविता में केवल सौंदर्य ही नहीं, बल्कि सत्य और संवेदना भी खोजते हैं।

यह पुस्तक अतीत की कथा नहीं, वर्तमान के लिए एक संवाद है—
स्त्री, धर्म और मनुष्यता के बीच।

About the Author

रूपेश रंजन समकालीन हिंदी साहित्य के एक संवेदनशील कवि और विचारक हैं, जिनकी लेखनी भारतीय परंपरा, मिथक और दर्शन को आधुनिक दृष्टि से देखने का प्रयास करती है। उनके काव्य में इतिहास केवल स्मृति नहीं बनता, बल्कि वर्तमान से संवाद करता हुआ जीवंत अनुभव बन जाता है।

रूपेश रंजन की रचनाओं का केंद्र स्त्री-चेतना, नैतिक द्वंद्व, मानवीय संवेदना और धर्म का मानवीय पक्ष रहा है। वे पौराणिक स्त्रियों को आदर्श या प्रतीक मात्र के रूप में नहीं, बल्कि निर्णय लेने वाली, प्रश्न करने वाली और पीड़ा के बीच भी गरिमा बनाए रखने वाली व्यक्तित्वों के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनकी कविता शोर नहीं करती, बल्कि गहराई से प्रश्न पूछती है।

लेखक की विशेषता यह है कि वे मौन, पीड़ा और अंतर्द्वंद्व को भी भाषा देते हैं। उनके शब्द करुणा से उपजते हैं और विवेक की ओर ले जाते हैं। काव्य उनके लिए केवल सौंदर्य का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक, नैतिक और आत्मिक चिंतन का साधन है।

यह कृति—कुन्ती, गांधारी, सीता, तारा और मंदोदरी पर केंद्रित—उनकी साहित्यिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जहाँ वे भारतीय महाकाव्यों की स्त्री-पात्रों को नए अर्थ, नई आवाज़ और नया सम्मान प्रदान करते हैं।

रूपेश रंजन का लेखन उन पाठकों के लिए है जो कविता में केवल भावुकता नहीं, बल्कि गहराई, प्रश्न और सत्य की खोज करते हैं।
उनकी रचनाएँ पाठक को पढ़ने के बाद भी भीतर तक सोचने के लिए विवश करती हैं—और यही उनकी साहित्यिक पहचान है।

Book Details

Number of Pages: 409
Dimensions: 6"x9"
Interior Pages: B&W
Binding: Paperback (Perfect Binding)
Availability: In Stock (Print on Demand)

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