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यह काव्य-पुस्तक भारतीय महाकाव्य परंपरा की पाँच महान स्त्रियों—कुन्ती, गांधारी, सीता, तारा और मंदोदरी—के जीवन, संघर्ष और आंतरिक शक्ति का काव्यात्मक अन्वेषण है। यह संग्रह इतिहास को दोहराने का प्रयास नहीं करता, बल्कि उन भावनाओं, प्रश्नों और नैतिक द्वंद्वों को स्वर देता है जिन्हें समय ने प्रायः मौन में छोड़ दिया।
इस पुस्तक की कविताएँ इन स्त्रियों को केवल पौराणिक पात्रों के रूप में नहीं, बल्कि संवेदनशील, विचारशील और निर्णय लेने वाली चेतनाओं के रूप में प्रस्तुत करती हैं। यहाँ मातृत्व है, पर उसके साथ असहायता भी है; त्याग है, पर उसके पीछे छिपा आत्मबल भी है; मौन है, पर वह प्रश्नों और विरोध से भरा हुआ है।
कुन्ती की कविताएँ माँ होने के बोझ, अपराधबोध और दूरदर्शिता को उद्घाटित करती हैं।
गांधारी के माध्यम से सत्ता, नैतिकता और मौन की कीमत पर प्रश्न उठाए गए हैं।
सीता की कविताएँ स्त्री की गरिमा, आत्मसम्मान और सत्यनिष्ठा का उत्सव हैं।
तारा विवेक, राजनीतिक समझ और भावनात्मक बुद्धिमत्ता का स्वर हैं।
और मंदोदरी धर्म, करुणा और अहंकार के विरुद्ध खड़ी अंतरात्मा का प्रतीक बनकर सामने आती हैं।
यह पुस्तक नारी-शक्ति को आदर्शीकरण के बजाय यथार्थ के धरातल पर रखती है—जहाँ पीड़ा भी है, दुविधा भी, और फिर भी एक अडिग नैतिक दृढ़ता है। यह संग्रह पाठक को यह सोचने के लिए आमंत्रित करता है कि महानता तलवार या सत्ता में नहीं, बल्कि सही के पक्ष में खड़े होने के साहस में निहित होती है।
यह कृति उन सभी पाठकों के लिए है जो भारतीय परंपरा को नए दृष्टिकोण से पढ़ना चाहते हैं, जो स्त्री-स्वर की गहराई को समझना चाहते हैं, और जो कविता में केवल सौंदर्य ही नहीं, बल्कि सत्य और संवेदना भी खोजते हैं।
यह पुस्तक अतीत की कथा नहीं, वर्तमान के लिए एक संवाद है—
स्त्री, धर्म और मनुष्यता के बीच।
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