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क्या तुमने कभी सोचा — जो विश्वास तुम मानते हो, वह सच में तुम्हारा है, या सिर्फ़ विरासत में मिला है?
यह किताब कोई नया धर्म नहीं देती। यह एक ईमानदार निमंत्रण है — रुककर पूछने का, जाँचने का, और अपना अर्थ ख़ुद गढ़ने का। तीन हिस्सों में बँटी यह यात्रा तुम्हें ले जाती है — पहले उन विश्वासों तक जो तुमने कभी चुने नहीं, फिर अपने मूल्य और नैतिक संहिता गढ़ने तक, और आख़िर में उसे असली ज़िंदगी — पैसे, रिश्तों, अपराधबोध — पर लागू करने तक।
यह किताब तुम्हें कोई अंतिम जवाब नहीं देती। यह तुम्हें बस एक चीज़ देती है — प्रश्न पूछने की, और अपनी जागी हुई चेतना पर भरोसा करने की हिम्मत।
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