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सृजन का विज्ञान: संभोग केवल क्रिया नहीं, जिम्मेदारी है
जिस प्रकार उत्तम फसल के लिए केवल बीज डाल देना पर्याप्त नहीं होता —
उसके लिए चाहिए सही कृषि ज्ञान, उत्तम बीज, उपयुक्त भूमि, अनुकूल वातावरण और निरंतर देखभाल —
उसी प्रकार यदि हमें पृथ्वी पर एक सशक्त, संतुलित और जागरूक भावी पीढ़ी का निर्माण करना है, तो हमें सृजन के आधार — संभोग — के ज्ञान को समझना ही होगा।
संभोग केवल एक जैविक क्रिया नहीं है।
यह सृजन की प्रक्रिया है।
यह दो शरीरों का नहीं, दो चेतनाओं का मिलन है।
यह केवल क्षणिक आनंद का साधन नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ी का बीजारोपण है।
आज समाज में यदि यौन विषय केवल छिपाया जाता है, दबाया जाता है, या फिर केवल मनोरंजन और वासना के स्तर पर प्रस्तुत किया जाता है, तो परिणाम क्या होगा?
जब संभोग का ज्ञान अनुपस्थित होगा,
जब जिम्मेदारी की शिक्षा नहीं दी जाएगी,
जब मनोवैज्ञानिक, शारीरिक और सामाजिक पक्षों को समझे बिना केवल आवेग में निर्णय होंगे —
तब “सेक्स” जीवन का सर्वोच्च आनंद समझ लिया जाएगा, और सृजन की पवित्रता भुला दी जाएगी।
परिणामस्वरूप —
अनजाने, असावधान और केवल क्षणिक वासना के आवेग में बने संबंधों से ऐसी पीढ़ी का जन्म होता है जो:
शारीरिक रूप से कमजोर,
मानसिक रूप से असंतुलित,
भावनात्मक रूप से असुरक्षित,
और सामाजिक रूप से दिशाहीन हो सकती है।
यह किसी एक पीढ़ी की आलोचना नहीं है।
यह चेतावनी है — कि अज्ञान में किया गया सृजन, अज्ञान को ही आगे बढ़ाता है।
इसलिए आवश्यक है — संभोग का सम्यक ज्ञान
यौन शिक्षा को अश्लीलता नहीं, विज्ञान और संस्कार के रूप में देखा जाए।
युवाओं को शरीर के साथ मन और जिम्मेदारी का भी ज्ञान दिया जाए।
सृजन से पहले परिपक्वता, स्थिरता और सजगता को महत्व दिया जाए।
संभोग को केवल “आनंद” नहीं, “उत्तरदायित्व” के रूप में समझा जाए।
वासना बनाम जागरूक सृजन
वासना तूफान है —
क्षणिक, उग्र, अंधा।
जागरूक सृजन दीपक है —
स्थिर, उज्ज्वल, दिशा देने वाला।
यदि समाज केवल वासना को बढ़ावा देगा, तो परिणाम दुर्घटनात्मक (accidental) संबंध और असंतुलित सामाजिक संरचना होगी।
लेकिन यदि समाज ज्ञान, संवाद और जिम्मेदारी को महत्व देगा, तो भावी पीढ़ी अधिक सशक्त, संवेदनशील और जागरूक होगी।
भविष्य की खेती आज से शुरू होती है
जैसे किसान बीज बोने से पहले भूमि तैयार करता है,
उसी प्रकार सृजन से पहले मन, संबंध और परिस्थिति की तैयारी आवश्यक है।
संतुलित संभोग ही संतुलित समाज का आधार है।
जागरूक सृजन ही श्रेष्ठ मानवता का मार्ग है।
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