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रामगढ़ी में अखाड़े की घंटी सुबह चार बजे बजती है। चौदह साल की नंदिनी उसे छत से सुनती है। लड़के मिट्टी में उतर सकते हैं। उसे बस दूर से देखना है।
नंदू उस दूरी को मानने से इनकार करती है। मगर कुश्ती सीखने के साथ उसे पंचायत के फ़रमान, घर की चिंता, क़र्ज़ और चोट से भी लड़ना होगा। गाँव की मिट्टी से शहर के हॉस्टल और विदेशी मैट तक, हर पड़ाव उसका कुछ छीनता है और कुछ नया सिखाता है।
यह अपनी जगह माँगने की नहीं, गिरकर उसे फिर से बनाने की कहानी है।
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