You can access the distribution details by navigating to My Print Books(POD) > Distribution
कुंडेश्वर के छोटे कस्बे में मुनीम गोकुल की लाल बही, अध्यापिका का साहस और जुलाहे की बेटी शबनम के हाथों का धागा एक बदलते समय से जुड़ जाते हैं। आज़ादी की पुकार के बीच रोज़ी, डर और रिश्तों के सवाल भी उनके सामने खड़े हैं।
यह उन साधारण लोगों की कहानी है जिन्हें इतिहास के बड़े पन्नों में जगह नहीं मिलती, लेकिन जिनके छोटे फैसलों में एक नए देश का ताना-बाना बुना जाता है।
Currently there are no reviews available for this book.
Be the first one to write a review for the book अधबुना तिरंगा.