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कुछ प्रतीक्षाएँ युगों तक साँस लेती हैं। वंशीवन का बाँस हर इकतालीस साल में एक बार फूलता है - १९८१ से आज तक, हर बार उसी दिन। और कहते हैं, जो वंशी पहले फूँकता है, वह अपनी स्मृतियाँ दे देता है। वानी के पास टूटी वंशी के इकतालीस टुकड़े हैं और इकतालीस दिनों की प्रतीक्षा। नीलाभ के पास एक धड़कन है, जो थमने को तैयार नहीं। बाढ़ का पानी चढ़ता जा रहा है, और पूर्णिमा की दो सौ छियालीस साल पुरानी प्रतीक्षा अपने आख़िरी मोड़ पर है। जब अंतिम फूँक गूँजती है, तो कोई अपना सब कुछ भूल जाता है - ताकि कोई और अपना सब कुछ पा ले। प्रेम, त्याग और प्रतीक्षा की एक ऐसी कथा, जो दिखाती है कि कुछ रिश्ते अधूरे रहकर भी पूर्ण हो जाते हैं।
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