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रात का समंदर। पूर्णिमा का चाँद। और पानी की रेखा पर खड़ी एक औरत, जिसके पैर उलटे हैं और जिसकी आँखों से काला धुआँ उठता है।
वह तारा की माँ है।
नौ सौ साल से जीता अद्रिक वर्धन अब तक सिर्फ़ भागता आया है: अपने गुनाह से, अपने दोस्त भैरव से, उस एक रात से जब उसने जिन्हें बचाना था उन्हें खो दिया। पर इस बार उसके पीछे सिर्फ़ उसका अतीत नहीं है। उसके साथ चलने वाले चार जवान लोग हैं। एक का पाँव धीरे-धीरे पत्थर हो रहा है, एक की याद मंत्रों की क़ीमत में छिनती जा रही है, और एक ऐसी चीज़ें देख लेती है जो अभी हुई नहीं।
बागबाज़ार की एक पुरानी हवेली, बंगश्री मिल की चिमनी, और आदि गंगा का एक सूखता कुंड। हर जगह एक ही सवाल पीछा करता है: क्या माफ़ी उस अभिशाप से बड़ी हो सकती है जो उसके बिना टूटता नहीं?
और जब भैरव के आख़िरी शब्द सामने आते हैं, तब सबसे बड़ा सच यह नहीं रहता कि दुश्मन कौन था। सबसे बड़ा सच यह बन जाता है कि अपनों में से किसी ने पहले ही सौदा कर लिया था।
अमर होना सबसे लंबा इंतज़ार है। माफ़ी माँगना उससे भी लंबा।
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