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चंबल के काल्पनिक गाँव कोठारा में एक बूढ़े के माथे का घाव कभी पूरी तरह नहीं भरता। कुछ लोग उसे अश्वत्थामा कहते हैं। दिल्ली से आई पत्रकार मिताली चौहान उस नाम के पीछे का जीवन समझना चाहती है। फोटोग्राफर इरफ़ान के साथ उसकी यात्रा अलग-अलग लोककथाओं, एक झूठी गवाही और स्मृति की कठिन सीमाओं से गुज़रती है।
जब गाँव लौटने पर बुज़ुर्ग की इच्छा एक पर्यटन परियोजना के प्रचार के नीचे दबती दिखाई देती है, जाँच का प्रश्न बदल जाता है। अब कथा की उम्र नहीं, व्यक्ति की आवाज़ और साझा ज़मीन का अधिकार सामने हैं। बूढ़े का अतीत भी धीरे खुलता है। उसमें एक निर्दोष की मृत्यु है, अपना घर खोता पिता और क्षमा न देने का पूरा अधिकार रखने वाला परिवार।
यह उपन्यास किसी पौराणिक पात्र को सिद्ध या असिद्ध नहीं करता। वह पूछता है कि एक जीवित आदमी कब कहानी के भीतर आश्रय पाता है, और कब उसी कहानी में बंद हो जाता है।
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