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एक रात। पाँच असुर-कुल। सात अतिथि।
और प्रवेश की सूची में एक नाम कम।
हीरापुर की गुफाओं में अमावस की सभा को तय करना है कि टूटते पर्दे के उस पार से हमला हो रहा है, या कोई भीतर से बाहर आना चाहता है। इतिहासकार सायरा की प्रति और परिषद का पुराना मूल एक-दूसरे से मेल नहीं खाते। सेनापति की मुहर गलत रास्ते पहुँची है। व्यापारियों के दरवाज़े बंद हैं। गवाह बोलने से पहले गायब किए जा रहे हैं।
वेश, तारा, ज़ोरम, विकी और अन्वया अपने साथ अद्रिक और सायरा को लेकर उस कमरे में आए थे जहाँ हर कुल अपना सत्य रखता है। अब उन्हें उस सत्य की कीमत भी देखनी होगी। किसी मंत्र से एक चेहरा मिटेगा। किसी सीढ़ी पर रक्त बचेगा। किसी खाली कुर्सी का नाम काटने नहीं दिया जाएगा।
लेकिन सबसे बड़ा भय गद्दार की पहचान नहीं।
यह है कि दीवार जिस दिशा में हिल रही है, वहाँ उनका अपना रक्त खड़ा है।
अंतराल यूनिवर्स की पहली श्रृंखला "टूटता पर्दा" का पाँचवाँ उपन्यास।
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