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इस लोक में आईने सिर्फ शीशे नहीं, राहें हैं। हर आईने के पार एक राह खुलती है, और उस राह से प्रतिबिंब उतरकर चलने लगते हैं। वही चेहरा, वही आवाज़, वही शब्द।
सारंग, इनाया, अर्यमन और श्रुति इस लोक में उतरते हैं, और चौदहवाँ द्वार खुला है। यहाँ अपने को अपना कहने के लिए एक नई प्रथा गढ़नी पड़ती है: पहचान-शब्द। तभी चारों के सामने दूसरा सारंग खड़ा होता है, वही चेहरा, वही आवाज़, वही चाल, जो सारंग की सुनी और कही हुई बातें जानता है, और जो पहचान-शब्द तक पार कर जाता है।
शतद्वार की चौदहवीं किताब एक सवाल रखती है: जब चेहरा, आवाज़, बातें और पहचान-शब्द तक मिल जाएँ, तो पहचान किस चीज़ की होती है? और जिसे पहचानना हो, उसे आख़िर कौन पहचानता है?
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