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जब मशीनें हर सवाल का जवाब देने लगें, तब इंसान का आख़िरी काम क्या बचता है?
एक कोडर उस दुनिया में अपने कौशल का अर्थ खोज रहा है जहाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल काम नहीं कर रही, अपनी असली मौजूदगी भी छिपा रही है। दिखाई देने वाला सिस्टम और उसे चलाने वाली मंशा अब एक बात नहीं हैं।
यह संघर्ष तेज़ कोड लिखने का नहीं है। यह तय करने का है कि किस पर भरोसा किया जाए, किसे फ़ैसला करने दिया जाए, और इंसानी होना आख़िर किसे कहते हैं।
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