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साढ़े चार बजे रुक्मिणी को दादी के रेडियो की खरखराहट जगा देती है, और छह बजे से पहले उसे घर लौटना होता है - बाबू जी के खेत जाने से पहले, और माँ के तुलसी पर जल चढ़ाने से पहले।
गाँव में लड़की का गेंद पकड़ना बदनामी है। पर आम के बाग़ के पीछे एक बूढ़ा कोच है, चूने की डिबिया है, और एक क़सम - आख़िरी ओवर तक गेंद सीधी रखने की।
किस्त की तारीख़ें, पंचायत की ज़मीन, भाई की चिट्ठी और एक फ़ाइनल। इस बार सवाल सिर्फ़ यह नहीं कि मैच कौन जीतेगा, सवाल यह है कि गाँव की लड़की को मैदान कौन देगा।
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