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मीरगढ़ की रात। रेडियो स्टेशन की एक पुरानी लाल बत्ती, और माइक के पीछे एक आवाज़ जो हर रात दूसरों को सुलाती है।
चौंतीस साल की सुगंधा कभी एक उस्ताद की सबसे होनहार शिष्या थी। फिर उसने गाना छोड़ दिया, और छह बरस से सिर्फ़ बोलती है। एक पुरानी हवेली में उस्ताद की विधवा सलीमा बेगम एक बंद कमरा सँभाले बैठी हैं। एक बूढ़े सारंगी वादक, एक सोलह साल की तबला-वादिका, एक चुपचाप चाय बनाने वाला शागिर्द और एक महोत्सव की समिति, सबके हाथ में किसी न किसी अधूरी चीज़ का एक सिरा है।
सात रातों का संगीत महोत्सव पास आ रहा है, और सातवीं रात के कार्यक्रम में एक अप्रकाशित बंदिश का नाम छपा है। उसका चौथा हिस्सा अधूरा है। उसे कौन गाएगा, और अंत किसका होगा?
कोई खलनायक नहीं। कोई चमत्कार नहीं। बस एक दरवाज़ा, जो खुला रहना चाहता है।
अट्ठाईस अध्याय। एक रात। और एक धुन, जो अब भी सबकी है।
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