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किनारगढ़ की भोर माधवी की आवाज से खुलती है। मछली की पट्टी, लाल बही, घर का ऋण और स्कूल जाता बेटा: हर दिन उसके सामने भार रखता है। ओंकार समुद्र में अपना भविष्य देखता है। उसकी माँ उसी समुद्र में एक पुरानी अनुपस्थिति को पहचानती है।
पहाड़ी की मीनार में फणी काका की रातें बदलने वाली हैं। नए यंत्र उनकी सेवा सँभाल सकते हैं, लेकिन इतने वर्षों के बाद अपना दिन किसे सौंपें? इसी बीच आयशा मौसम का अध्ययन करने आती है। उसकी निगरानी और बंदर के पुराने अनुभव के बीच प्रश्न उठते हैं। फिर एक तूफानी रात में कुछ नावें देर से लौटती हैं।
आखिरी लौ केवल उस रात के बचाव की कहानी नहीं है। यह लौटने के बाद की चोट, मरम्मत की कीमत, मजदूरी की तारीख और अगले दिन खुलती कॉपी की कहानी भी है। यहाँ रोशनी एक हाथ में नहीं रहती। रास्ता उन सबके बीच बनता है जो किसी और के लौटने का काम अपने हिस्से में लेते हैं।
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