You can access the distribution details by navigating to My Print Books(POD) > Distribution
नौलखा हवेली तक पहुँचने के लिए इक्यावन सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। सरिता वर्मा गिनती है, क्योंकि गिनना उसका पेशा है।
संरक्षण-विशेषज्ञ सरिता एक पुराने बाँध के डूब-क्षेत्र में खड़ी इस हवेली के भित्ति-चित्र बचाने आती है। उसके पास इकतीसवें दिन की समय-सीमा है, एक नोटबुक है, और अपने पिता की अधूरी याद, जो कभी इसी हवेली की एक रात के बारे में चुप रह गए थे। आँगन में रोज़ शाम इक्यावन दीये जलते हैं। रखवाले कहते हैं कि आठवाँ दीया सबसे भारी होता है। रजिस्टर में तेरह घेरे हैं, और उनमें से एक का नाम उसे जाना-पहचाना लगता है।
जब पुल टूटता है और रास्ते बंद हो जाते हैं, तो सवाल सिर्फ़ यह नहीं रह जाता कि कौन निकलेगा। सवाल यह हो जाता है कि जो रुकेगा, वह किसके लिए रुकेगा, और जो पूछा जा रहा है, उसका जवाब कितनी जल्दी देना ठीक है।
Currently there are no reviews available for this book.
Be the first one to write a review for the book आठवाँ दीया.