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नयना खरे का काम दूसरों के संवाद साफ करना है। पिता की मृत्यु के बाद घर से आई एक पुरानी बैंगनी कैसेट सुनते हुए उसे अपनी बहन की विदाई में ऐसा शब्द मिलता है जो वह खुद बोलती थी।
क्या एक परिवार ने किसी और की आवाज़ पर गलत नाम रख दिया था? और अगर ऐसा हुआ, तो उस गलत नाम के साथ बिताए वर्षों का हिसाब कौन देगा?
एक छोटी ऑडियो-दुकान, अधूरे कागज और बचपन की बदलती यादों के बीच नयना उस आवाज़ के दूसरे सिरे तक पहुँचना चाहती है। मगर हर नया जवाब उससे यह भी पूछता है: सच जानना और किसी की जिंदगी अपने हाथ में लेना, क्या एक ही बात है?
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