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इक्कीस पड़ाव, दो सौ इक्यावन कविताएँ और एक बेनाम आदमी की पूरी उम्र। एक कमरे का बचपन, फ़ीस की तारीख़ का डर, बहन का त्याग, पहला प्यार, पहला धोखा, पिता का जाना और पैसे के बाद का ख़ालीपन: उम्रक़ैद एक उपन्यास है जो कविताओं में चलता है। गर्भ के अँधेरे से चिता की राख तक यह उन साधारण लोगों की कहानी कहता है जिनका बोझ सब देखते हैं, पर जिनसे कोई उनका नाम नहीं पूछता।
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