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इस बस्ती में बची उम्र का सौदा होता है। देने वाला अपने आने वाले दिनों में से कुछ छोड़ता है, लेने वाला उतने दिन पाता है। पर खरीदी हुई उम्र जवानी नहीं लौटाती, और मापने वाली पट्टी मृत्यु का दिन नहीं बताती। जो चला गया, वह वापस नहीं आता।
सारंग, इनाया, अर्यमन और श्रुति उम्र-बाज़ार में पहुँचते हैं। खुले पटल पर सहमति सुनाई देती है, माप दिखता है और दाम रखा जाता है। फिर भी किसी की ज़रूरत, इच्छा और दबाव को समझ लेना इतना सीधा नहीं है।
शतद्वार की सत्ताईसवीं किताब पूछती है: किसी को रोकना कब सहारा होता है, और कब उसकी अपनी राह पर पकड़? हर सौदे के बाहर भी एक दिन बचा रहता है, जिसे अपने ढंग से जिया जा सकता है।
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