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इस बस्ती में हर सुबह तारीख़ एक दिन पीछे चली जाती है। लोग अपनी बड़ी उम्र के दिन याद रखते हैं और बचपन की ओर अनजान बढ़ते हैं। बाहर से आए सारंग, इनाया और अर्यमन के लिए यह उलझन है। यहाँ के लोगों के लिए यही रोज़ की ज़िंदगी है।
फिर एक पुराना जोड़ टूटता है। एक बच्चा सूखे समय-पथ के बीच जा गिरता है, जहाँ कुछ मिनट उससे बरस छीन सकते हैं। उसे लौटाने के लिए केवल साहस नहीं, सही नाप, स्वस्थ हाथ और पूरा रास्ता चाहिए। सारंग की हथेलियाँ अब भी घायल हैं। इस बार मदद करने का अर्थ खुद आगे कूद पड़ना नहीं होगा।
और उत्तर के किनारे एक चमकता पत्थर है। उसमें दिखाई देने वाली कोई झलक क्या आगे का जीवन तय कर देती है? या आदमी अनिश्चितता के बीच भी किसी के पास बैठने, उसे सुनने और अपना अगला कदम चुनने के लिए स्वतंत्र है?
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