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यहाँ नदी नीचे नहीं उतरती। वह चट्टानों के बीच ऊपर चढ़ती है, उन घरों की ओर जो बादलों में लोहे की जंजीरों से लटके हैं। नीचे की बस्ती के पात्र खाली हैं। ऊपर के घरों में पानी देहरी पार कर रहा है। दोनों किनारे एक-दूसरे को दोष देते हैं।
सारंग के हाथ अब भी पट्टियों में हैं। अर्यमन की टूटी बाँह उसे नीचे की मेज़ से बाँधे रखती है। इनाया के पास रास्ते की याद है, लेकिन इस नदी का उत्तर नहीं। पुरानी नली, अधूरे खाते और काम से हटाए गए कारीगर कुछ और कहानी कहते हैं।
एक रास्ता बच सकता है, पर उसे आज़माने की कीमत किसी अकेले नायक को नहीं चुकानी होगी। खतरा दोनों किनारों का है। फैसला भी दोनों का होना चाहिए। और भरोसा केवल सही बात कहने से नहीं बनता; कभी उसका अर्थ समय पर हाथ पीछे रखना होता है।
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