You can access the distribution details by navigating to My Print Books(POD) > Distribution
इस लोक में राजगद्दी जन्म या जीत से नहीं मिलती। यहाँ हर नागरिक की, बच्चा हो या बड़ा, एक दिन की बारी आती है: सुबह हथेली पर राजचिह्न उगता है, अगली सुबह बुझ जाता है, और उसी एक दिन में वही एक आदमी लोक के नागरिक कानून बदल सकता है। फरमान अपने शब्दों में, लिपिक की दोहराई के बाद अपनी पुष्टि, तब मुहर। बारी न बढ़ सकती है, न हथियाई जा सकती है।
दस साल के युग की बारी सत्रहवें दिन आती है, और उसी दोपहर एक हमला तय है: भंडार-प्रबंधक द्वार की राह और गोदाम अपने कब्जे में चाहता है। एक पुराना कानून सेवा-फाटक सिर्फ लिखित भंडार-दलों के लिए खोलता है, और खतरे के दिन आम लोग उसी राह से बाहर रह जाते हैं।
युग के सामने दो रास्ते हैं: पहरेदारी वाली तंग राह में भरोसे की प्रतीक्षा, या हर खतरे में पड़े आदमी के लिए राह खोल देना, सामान और सुरक्षित स्थिति की क़ुर्बानी के साथ। सारंग अपनी सलाह और उसकी कीमत खुलकर कहता है, पर चुनाव अपने शब्दों में युग को ही करना है।
शतद्वार की सत्रहवीं किताब एक सवाल रखती है: किसी बच्चे के चुनाव की रक्षा का मतलब क्या है? उसे सबूत, रास्ते और सुरक्षा देना, या उसका फैसला छीन लेना? और जब राजगद्दी सिर्फ एक दिन की हो, तो उस एक दिन का हिसाब कौन रखता है?
Currently there are no reviews available for this book.
Be the first one to write a review for the book एक दिन का राजा.