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जंगल जाग गया है। और वह ईरा की आवाज़ पहचानता है।
तारापीठ के पास का काँच-वन सदियों से सोया था। ईरा की आवाज़ ने उसे जगा दिया है। पेड़ों की पत्तियाँ घंटियाँ हैं, हिरण दर्पण के बने हैं, और हर प्रतिबिंब सच नहीं बोलता।
इस साल ईरा छायाभास सीखती है, और उसे पता चलता है कि उसकी आवाज़ में जो बसा है, वह कोई मामूली स्वर नहीं। पिता के सामने एक रात सच खुलने वाला है। और जंगल के किसी कोने में, ईरा की अपनी परछाई एक पल को उससे अलग चलती दिखती है।
जब आपकी अपनी आवाज़ आपसे बड़ी हो जाए, तो उसे सँभालने की क़ीमत कौन चुकाता है?
काँच का जंगल तारापीठ गाथा की चौथी पुस्तक है: जादू, दोस्ती और असली भारत के भीतर छिपी एक दुनिया की कहानी।
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