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शादी नहीं, रिश्ता।
पहाड़ी कस्बे करकोट के पुराने बंगले देवदार निवास की ऊपरी मंज़िल पर चैताली और सुमंत किराएदार बनकर आते हैं। कस्बा उन्हें पति-पत्नी मान लेता है, और दोनों इस झूठ को चुप रहकर निभा लेते हैं।
नीचे सुलोचना दीदी चाबियों का गुच्छा सँभाले सब देखती हैं। पर चौक की चौपाल, हलवाई की दुकान और एक माँ की आँखें सच से ज़्यादा देर नहीं चूकतीं।
शादी नहीं, रिश्ता। पर सवाल यह है कि कस्बा इसे कब तक रिश्ता रहने देगा।
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