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इस लोक में रंजिश सिर्फ़ मन में नहीं रहती। जब कोई अपना गिला कहकर बीज बोता है, तो धरती से हथियार उगते हैं। दो गुटों की पुरानी लड़ाई ने ऐसा जंगल खड़ा कर दिया है जो अब उन्हीं के रास्ते रोक रहा है।
सारंग, इनाया, अर्यमन और श्रुति को जंगल के बीच दबे हिसाब खोलने हैं। किसका रास्ता छीना गया? किसकी हानि अब तक अनसुनी है? और लोग अपने हथियार छोड़ें भी तो अपनी सुरक्षा किसके भरोसे करें?
इस बार अर्यमन के सामने भी एक बीज है, और अपना एक गिला। उसे कहना और उसे बो देना एक ही बात नहीं। मगर जो क्रोध बाहर न उगे, क्या वह भीतर भी मिट जाता है?
शतद्वार की पंद्रहवीं किताब में जीत सिर्फ़ हथियारों का जंगल पार करना नहीं, उसके बिना जीने की राह बनाना है।
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